अंजान

मैं बेकार बेमतलब का और बदतमीज़ हूँ,
मुझे अंजान ही रहने दो, पत्थर कि तरह पड़ा रहने दो !

थोड़ी दूर पर मैंने एक ख्वाब छोड़ा है,
उसकी सिसकियाँ अभी तक सुन रहा हूँ,
मासूम सपना बहुत याद आ रहा है,
उसकी याद में अभी तक लिख रहा हूँ,
मैं बुस्दिल, डर गया और पराजित हूँ,
मुझे अंजान ही रहने दो, पत्थर कि तरह पड़ा रहने दो !

कुछ आग ने जलाया कागज को,
कुछ कागज को जलने का मन था,
कुछ मैंने तोडा सपने को,
कुछ सपना मेरा भरी था,
मैं अभागा, मजबूर था और गुमनाम हूँ,
मुझे अंजान ही रहने दो, पत्थर कि तरह पड़ा रहने दो !
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