आज का दिन भी बीत गया

हम मौसम की परवाह नहीं करेंगे, अब हम दिल खोल कर रोयेंगे,
इस उम्मीद में कि सब बदलेगा, आज का दिन भी बीत गया !

झूठ सुनकर कान दर्द में कराहते है,
होंठ सच बोलने से छिल जाते है,
फिर भी हम दूर नहीं जाते है,
बटोरते है झूठ रात में पी जाते है,
झूठ का ज़हर हम पीते रहेंगे, पर सच कभी नहीं बोलेंगे ,
इस उम्मीद में कि सब बदलेगा, आज का दिन भी बीत गया !

हर दिन हम रंगों से होली खेलते है,
रंग तनाव और तिरस्कार के होते है,
खेलकर होली दर्द और घाव मिलते है,
बदलते है ज़ख़्म और मलहम लगते है,
इस रंग को कीचड़ में बदल देंगे, पर इसका मज़ा नहीं चुकेंगे ,
इस उम्मीद में कि सब बदलेगा, आज का दिन भी बीत गया !
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