August 2011

सम्बन्धों को कुछ करीब से देखा है मैंने,
अक्सर सम्बन्धों की मार झेली है मैंने !
बिखरते रिश्तों को खून से जोड़ा है मैंने,
जोड़ कर रिश्तों को अपना दिल् तोड़ा है मैंने !

जहाँ दिल् में रखते लोग विष है,
मुहँ से उगलते सिर्फ गुड़ है,
हम समझे की ये बाग के फूल है,
मेरा दिल् कच्चा और बेवकूफ है!

दिल् की बेवकूफी से बहुत कुछ हरा है मैंने,
सच्चे दिल् से कई बार रोया है मैंने !

स्नेह में होती बहुत गहराई है,
हमने समझा इसमें सिर्फ सच्चाई है,
छूकर देखा तो जाना ये परछाई है,
जानकर ये सब मन मेरा दुखी है,

अकेले अकेले कितनी तन्हाई बटोरी है मैंने,
बटोर कर काँटों का हर उसे सहेजा है मैंने !

काटें है राह में फिर भी उसी पर चलूँगा !
मुश्किलें कितनी भी हो अपने दम पे जिऊंगा !

बरसती है धुप फिर भी पेड़ छांव नहीं चाहती,
सुख जाती है नदिया पर पानी तलाश नहीं करती,
एक अपाहिज भी रहम को स्वीकार नहीं करता,
बर्बाद होती है फ़सल पर किसान हिम्मत नहीं हारता !

बढ़ती हो मुश्किलें पर मेहरबानी की रोटी नहीं खाऊंगा !
मुश्किलें कितनी भी हो अपने दम पे जिऊंगा !

सफ़र में जवान जगह ढूंढते बूढ़े खड़े नज़र आते है,
कैसी पीढ़ी है होश आते ही स्वाभिमान बेच देती है,
दोस्ती और रिश्तों की नाव में सपने पूरी करती है,
आज से चलिए हम सब मेहरबानी को दुत्कारते देते हैं !

तो सोचा है मुसीबत में भी रूह की आवाज़ सुनेंगे !
मुश्किलें कितनी भी हो अपने दम पे जिऊंगा !

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