मेहरबानी

काटें है राह में फिर भी उसी पर चलूँगा !
मुश्किलें कितनी भी हो अपने दम पे जिऊंगा !

बरसती है धुप फिर भी पेड़ छांव नहीं चाहती,
सुख जाती है नदिया पर पानी तलाश नहीं करती,
एक अपाहिज भी रहम को स्वीकार नहीं करता,
बर्बाद होती है फ़सल पर किसान हिम्मत नहीं हारता !

बढ़ती हो मुश्किलें पर मेहरबानी की रोटी नहीं खाऊंगा !
मुश्किलें कितनी भी हो अपने दम पे जिऊंगा !

सफ़र में जवान जगह ढूंढते बूढ़े खड़े नज़र आते है,
कैसी पीढ़ी है होश आते ही स्वाभिमान बेच देती है,
दोस्ती और रिश्तों की नाव में सपने पूरी करती है,
आज से चलिए हम सब मेहरबानी को दुत्कारते देते हैं !

तो सोचा है मुसीबत में भी रूह की आवाज़ सुनेंगे !
मुश्किलें कितनी भी हो अपने दम पे जिऊंगा !
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