2012

हार से आगे जीत का सफर
अपनी किस्मत के सितारों को गर्दिश से सफलता की बुलंदियों पर पहुंचानेवाली कल्पना सरोज उन महिलाओं के लिए एक मिसाल हैं, जो अपने दम पर आगे जाने का हौसला रखती हैं. आज वे करोड़ों रुपये की कंपनी की मालकिन हैं. लेकिन उनके जीवन में एक ऐसा दिन भी आया था, जब गरीबी, शोषण और अपने साथ हो रहे पक्षपात के कारण कल्पना आत्महत्या करने का प्रयास कर बैठी थीं. आज जब कल्पना अब तक के सफर की दास्तां सुनाती हैं, तो लोगों को वह किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं लगती.
कल्पना के जीवन में परेशानियों का सिलसिला तब शुरू हुआ, जब मात्र 12 वर्ष की उम्र में उनका विवाह उनसे 10 वर्ष बड़े व्यक्ति के साथ कर दिया गया. विवाह के बाद कल्पना मुंबई आ गयीं, लेकिन यहां झुग्गी में रहना उनके लिए असहनीय था. उस पर ससुरालवालों का अत्याचार भी सहना पड़ता. कल्पना को वापस अपने पिता के घर जाना पड़ा. कल्पना का कहना है कि उनके पति के बड़े भाई और भाभी न सिर्फ उनके साथ बुरा व्यवहार करते थे, बल्कि उन्हें शारीरिक रूप से भी प्रताड़ित करते थे. वह प्रतिदिन इन सबसे जूझती थीं. घर वापस लौटने के बाद उन्हें लोगों की नजरों का सामना करना पड़ा. लेकिन इस सबके बावजूद कल्पना सरोज ने हिम्मत नहीं हारी और आत्मनिर्भर बनने के लिए सिलाई सीखना शुरू किया. इस काम से वह पैसे तो कमाने लगी थीं, लेकिन उन पर सामाजिक दबाव इतना ज्यादा बढ.ने लगा था कि इससे छुटकारा पाने के लिए उन्होंने जहर खाकर आत्महत्या करने का प्रयास किया, पर डॉक्टरी मदद के कारण वह बच गयीं.

नये जीवन की शुरुआत 
इस घटना के बाद कल्पना ने निर्णय लिया कि वह अपने जीवन को यूं ही गुमनामी में नहीं खोने देंगी. इस नये जीवन ने उनमें कुछ अलग करने और अपनी एक जगह बनाने की हिम्मत पैदा की. उन्होंने फैसला किया कि वे हारेंगी नहीं, बल्कि अपने हौसलों से उन सभी परेशानियों को हरा देंगी, जो उन्हें जीने नहीं दे रहीं. 16 साल की उम्र में कल्पना एक बार फिर अपने एक परिचित के पास मुंबई वापस आयीं और यहां सिलाई का काम करने लगीं. शुरू में उन्हें एक दिन में 50 रुपये से भी कम मिलते थे, लेकिन फिर उन्होंने औद्योगिक सिलाई मशीन चलानी सीखी, जिसके कारण उनकी आय में बढ.ोतरी हुई. अब तक कल्पना को जीवन में पैसे की अहमियत समझ आ चुकी थी. उन्होंने फर्नीचर का व्यापार करने और सिलाई के काम को बढ़ाने के लिए सरकारी ऋण लिया. वह दिन के 16 घंटे काम करती थीं, जो आज भी कायम है. उम्र के परिपक्व मुकाम पर पहुंचने के बाद कल्पना ने एक व्यापारी से विवाह किया. उनके दो बच्चे हैं. 

अपनी स्वतंत्र पहचान बना चुकी कल्पना को कमानी ट्यूब्स नामक कंपनी चलाने का मौका मिला, जो कर्ज में थी. लेकिन उन्होंने अपनी मेहनत और लगन से बंद होने की कगार पर पहुंच चुकी इस कंपनी की किस्मत पलट दी. आज कमानी ट्यूब्स 500 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य की एक निरंतर बढ.ती हुई कंपनी है, जिसके नाम पर मुंबई में दो सड़कें भी हैं.

यह कहानी प्रभात खबर से है !
पढ़िए Economic Times क्या लिखता है !
कल्पना सरोज का वेबसाइट, उनकी कम्पनी का वेबसाइट !

- This Article Posted on: August 28th, 2012 in प्रभात खबर !
बहुत पुरानी बात है. मिस्र देश में एक सूफी संत रहते थे, जिनका नाम जुन्नुन था. एक नौजवान ने उनके पास आकर पूछा, मुङो समझ नहीं आता कि आप जैसे लोग सिर्फ एक चोंगा ही क्यों पहने रहते हैं? बदलते समय के साथ यह जरूरी है कि लोग ऐसे लिबास पहनें, जिनसे उनकी शख्सीयत सबसे अलहदा दिखे और देखनेवाले वाहवाही करें.
जुन्नुन मुस्कुराये और अपनी उंगली से एक अंगूठी निकाल कर बोले, ‘बेटे, मैं तुम्हारे सवाल का जवाब जरूर दूंगा, लेकिन पहले तुम मेरा एक काम करो. इस अंगूठी को सामने बाजार में एक अशर्फी में बेच कर दिखाओ.’ नौजवान ने जुन्नुन की साधारण-सी दिखनेवाली अंगूठी को देख कर सोचा, इस अंगूठी के लिए सोने की एक अशर्फी? इसे तो कोई चांदी के एक दीनार में भी नहीं खरीदेगा.
‘‘कोशिश करके देखो, शायद तुम्हें कोई खरीदार मिल जाये.’’ जुन्नुन ने कहा. नौजवान तुरंत ही बाजार को रवाना हो गया. उसने वह अंगूठी बहुत से सौदागरों, परचूनियों, साहूकारों, यहां तक कि हज्जाम और कसाई को भी दिखाई, पर उनमें से कोई भी उस अंगूठी के लिए एक अशर्फी भी देने को तैयार न हुआ. हार कर उसने जुन्नुन को जाकर कहा, ‘‘कोई भी इसके लिए चांदी के एक दीनार से ज्यादा रकम देने के लिए तैयार नहीं है.’’
जुन्नुन ने मुस्कुराते हुए कहा, अब तुम इस सड़क के पीछे सुनार की दुकान पर जाकर उसे यह अंगूठी दिखाओ. लेकिन तुम उसे अपना मोल मत बताना, बस यही देखना कि वह इसकी क्या कीमत लगाता है. नौजवान बतायी गयी दुकान तक गया. वहां से लौटते वक्त उसके चेहरे पर कुछ और ही बयां हो रहा था. उसने जुन्नुन से कहा, ‘‘आप सही थे. बाजार में किसी को भी इस अंगूठी की सही कीमत का अंदाजा नहीं है. सुनार ने इस अंगूठी के लिए सोने की एक हजार अशर्फियों की पेशकश की है. यह तो आपकी मांगी कीमत से भी हजार गुना है.’’
जुन्नुन ने मुस्कुराते हुए कहा, यही तुम्हारे सवाल का जवाब है. किसी भी इनसान की कीमत उसके लिबास से मत आंको. नहीं तो तुम बाजार के उन सौदागरों की तरह बेशकीमती नगीनों से हाथ धो बैठोगे.
बात पते कीः-
-किसी भी इनसान की कीमत उसके लिबास से न आंकें, अन्यथा आपको बेशकीमती नगीनों से हाथ धोना पड़ सकता है.
-बाहरी दिखावे से बचते हुए इनसान की पहचान उसके गुणों से करें, तभी आप उसका बेस्ट ले पायेंगे.

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