कार्य संस्कृति (कविता)

चलिए हम उस चश्मे को उतार दें , जो हमें सबके अवगुणों को दिखाए ,
ईर्ष्या, अहंकार की आग में जलना छोड़ दें, सबके गुणों से नई संस्कृति बनाएँ !

दुसरों से प्रथम पहल की उम्मीद छोड़ दें, पहले स्वयं सहयोग का हाथ बढ़ाएं,
अच्छी बातों को बातें न रहने दें, कठिन है पर उसे अपनी संस्कृति बनाएँ !

मशीनें भी अच्छी आबो-हवा में साथ दें, अच्छे माहौल से सबकी क्षमता बढ़ाएं,
चलिए नई पीढ़ी को सुनहरा भविष्य दें, अवगुण छोड़ गुणों की संस्कृति बनाएँ !
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